रविवार, 4 सितंबर 2016

कभी छूकर गुज़रो

आज लिखना भारी हो रहा है... हर्फ़ हर्फ़ जोड़ रहा हूं... मुश्किल होती है शब्दों की बुनावट में...
कई मिसरे आते और जाते हैं... कोई कागज़ पर ठहरता ही नहीं...
कैसे तुम्हारे होने को शब्दों में पिरो सकूँ..
याद है एक बार तुम आये थे मेरे पुराने वाले घर में...
शायद तुम्हें याद ना हो...
आज भी वो खिड़की और दरवाज़े तुम्हारे इंतज़ार में हैं....
तुमने छुआ था जिन चीज़ों को
जो दराज़ संभाली थी
उन पर आज भी तुम्हारे निशां बाकी हैं
वो किताबें जिन्हें अधूरा पढ़ के तुमने बुकमार्क लगा कर रख दिया था,
वो आज भी जस की तस रखी है...
पास वाले पेड़ पर टंगी हैं तुम्हारी यादें
गमलों में तुम्हारी खुशबु समाई है..
वो चादर पर तुम्हारे होने का अहसास आज भी है...
लगता है जैसे चादर की सलवटों में सिमटी हो तुम,
चाय के कप पर तुम्हारे होठों के निशान आज भी बने हैं...
कभी आओ... देखो... यहां ज़र्रा ज़र्रा तुम्हें देखने को बेताब है...

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