सोमवार, 5 सितंबर 2016

वो अजीब मुलाकात

तुमसे कई बार मैंने मुलाकात की होगी... लेकिन आज जब तुमसे मिला.. तो ना जाने क्यों मुलाकात में वो कशिश नहीं थी...जो हर बार तुमसे मिलके महसूस की होगी मैने... तुम्हारा आना...और मेरा अजीब सा व्यवहार करना..मेरी आदत में शुमार होने लगा है...ना चाहकर भी ऐसा होने लगा है...बाद में एक कसमसाहट सी रहती है... खुद को कोसता भी हूं, दिनभर एक ही टीस सालती रहती है, कि ना जाने तुम्हें कैसा लगा होगा, कैसे कहूं तुमसे, कि तुम्हें कितनी तवज्जो देता हूं, जब तुमसे अच्छा व्यवहार नहीं कर पाता, तो बुरा लगता है... आखिर ऐसा क्यों हो रहा है..खबर नहीं... खैर... जानता हूं तुम मेरा अच्छा और बुरा व्यवहार सहन करते हो...मैं जाने अनजाने में कुछ कह भी जाता हूं तुम्हारे बारे में... लेकिन पगला हूं ना... बाद में समझ आता है...ऐसा नहीं बोलना चाहिए था... लेकिन मैं जानता हूं कि तुम मेरी सच्ची साथी हो... तुम वो हो जो मेरी तमाम बुराईयों पर भी मेरी खुशी के खातिर पर्दा डाल देती हो... तुम वाकई मेरे लिए बहुत खास हो...
हमेशा ऐसे ही रहना.. आज वक्त की कमी के चलते जो लिखना चाह रहा था... वो नहीं लिख पाया...
लेकिन मैं जानता हूं कि तुमसे ही मेरा पूरा होना लिखा है... तुम्हें लिख देता हूं तो वो अपने आप में पूरा हो जाता है।
हेमंत

रविवार, 4 सितंबर 2016

कभी छूकर गुज़रो

आज लिखना भारी हो रहा है... हर्फ़ हर्फ़ जोड़ रहा हूं... मुश्किल होती है शब्दों की बुनावट में...
कई मिसरे आते और जाते हैं... कोई कागज़ पर ठहरता ही नहीं...
कैसे तुम्हारे होने को शब्दों में पिरो सकूँ..
याद है एक बार तुम आये थे मेरे पुराने वाले घर में...
शायद तुम्हें याद ना हो...
आज भी वो खिड़की और दरवाज़े तुम्हारे इंतज़ार में हैं....
तुमने छुआ था जिन चीज़ों को
जो दराज़ संभाली थी
उन पर आज भी तुम्हारे निशां बाकी हैं
वो किताबें जिन्हें अधूरा पढ़ के तुमने बुकमार्क लगा कर रख दिया था,
वो आज भी जस की तस रखी है...
पास वाले पेड़ पर टंगी हैं तुम्हारी यादें
गमलों में तुम्हारी खुशबु समाई है..
वो चादर पर तुम्हारे होने का अहसास आज भी है...
लगता है जैसे चादर की सलवटों में सिमटी हो तुम,
चाय के कप पर तुम्हारे होठों के निशान आज भी बने हैं...
कभी आओ... देखो... यहां ज़र्रा ज़र्रा तुम्हें देखने को बेताब है...